"हम सब हिंदुस्तानी पहले हैं!" राठौड़ का चित्तौड़ भाषण सुन हर आँख नम!
चित्तौड़ की मिट्टी बोलती है — और उस दिन राठौड़ ने उसकी आवाज़ सुनाई
चित्तौड़गढ़ का किला सिर्फ पत्थरों का
ढांचा नहीं है। यह भारत की आत्मा का एक टुकड़ा है। यहाँ की हर दीवार में एक कहानी है
— रानी पद्मिनी की, रानी कर्णावती की, उन हज़ारों-हज़ार नाम-अनाम वीरांगनाओं की जिन्होंने
जौहर की आग को गले लगाकर अपनी आन, बान और शान बचाई।
और जब इस भूमि पर जौहर श्रद्धांजलि समारोह
हुआ — जहाँ इतिहास ज़िंदा होता है, जहाँ भावनाएं शब्दों से ऊपर होती हैं — तो कर्नल
राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने एक ऐसा भाषण
दिया, जो सुनने वालों के दिलों में बहुत गहरे उतर गया।
उनके शब्द थे — "हम सब हिंदुस्तानी पहले हैं।"
सुनने में सरल। पर उस मंच पर, उस किले
के साये में, उन वीरांगनाओं की याद में — ये शब्द बज्र की तरह गिरे।
जौहर श्रद्धांजलि
समारोह — एक ऐसा आयोजन जो दिल हिला देता है
जौहर स्मृति संस्थान द्वारा आयोजित यह
समारोह हर साल चित्तौड़गढ़ किले में होता है — उसी स्थान पर जहाँ इतिहास की तीन महान
जौहर घटनाएं हुईं — 1303, 1535 और 1568 में।
इस वर्ष के समारोह में राठौड़ के साथ
उपस्थित थे महाराणा विश्वराज सिंह जी मेवाड़ — मेवाड़ के ऐतिहासिक राजवंश के वर्तमान उत्तराधिकारी — और
यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। लेकिन राठौड़ का संबोधन अपनी व्यक्तिगत गहराई
और राष्ट्रीय एकता के संदेश के लिए विशेष रूप से चर्चा में रहा।
यज्ञ की आहुति, पुष्पांजलि, और फिर मंच
से वे शब्द — जो सिर्फ एक भाषण नहीं थे, एक सैनिक और एक ओलंपियन की आत्मा की पुकार
थे।
रानी पद्मिनी
से लेकर ओलंपिक तक — एक सीधी रेखा
2004 के एथेंस ओलंपिक में जब कर्नल
राठौड़ ने शॉटगन उठाई थी, तो वे भारत के
1.4 अरब लोगों की तरफ से मैदान में उतरे थे — बिना किसी जाति, धर्म, प्रांत का भेद
किए। और जब उन्होंने रजत पदक जीता — वह पदक सबका था।
ठीक वैसे ही, चित्तौड़गढ़ की वीरांगनाएं
किसी एक समाज के लिए नहीं मरीं। वे उस भारत के लिए मरीं जो बिना आत्मसम्मान के जीने
से इनकार करता है।
राठौड़ ने इसी बिंदु को अपने भाषण में
पकड़ा — और कहा: "जो त्याग मेवाड़ की माताओं
ने किया, वह किसी एक की विरासत नहीं है। वह पूरे हिंदुस्तान की विरासत है। और इसीलिए
हम सब हिंदुस्तानी पहले हैं।"
🙏 भावना की गहराई
जब एक ओलंपिक पदक विजेता, जिसने 26 साल सेना
में देश की सेवा की, चित्तौड़ की भूमि पर खड़े होकर वीरांगनाओं को नमन करे — वह पल
किसी भी राजनीतिक भाषण से कहीं बड़ा होता है।
मेवाड़ की
तीन महान वीरांगनाएं — जिनके लिए राठौड़ ने सिर झुकाया
•
रानी पद्मिनी (1303 ईस्वी) —
अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय चित्तौड़ की रानी, जिनकी जौहर की कहानी भारतीय नारी
के सम्मान की सबसे बड़ी मिसाल बन गई।
•
रानी कर्णावती (1535 ईस्वी)
— राणा सांगा की विधवा, जिन्होंने गुजरात के बहादुर शाह के हमले के सामने 13,000 महिलाओं
के साथ जौहर किया। अदम्य साहस की प्रतीक।
•
1568 की वीरांगनाएं — जब अकबर
की सेना ने चित्तौड़ पर हमला किया, हज़ारों महिलाओं ने एक बार फिर जौहर को चुना। अनाम,
अनगिनत, अमर।
राठौड़ ने इन तीनों के प्रति अपनी श्रद्धांजलि
में कहा: "इनके नाम हमें याद हों या न
हों — इनका बलिदान हमारी रगों में बहता है।"
"हम
सब हिंदुस्तानी पहले हैं" — यह नारा नहीं, दिल की बात है
आज के राजनीतिक माहौल में ऐसे नेता कम
हैं जो बिना किसी राजनीतिक लाभ के एकता की बात करें। राठौड़ ने चित्तौड़ में जो कहा, वह ऐसे व्यक्ति
के शब्द थे जिसने एकता को सिर्फ पढ़ा नहीं, जिया है।
सेना में 26 साल — जहाँ हर जाति, हर
धर्म, हर प्रांत का जवान एक ही रंग की वर्दी पहनता है। ओलंपिक में — जहाँ तिरंगा सबका
होता है। और अब राजस्थान के मंत्री के रूप में — जहाँ वे युवाओं के लिए खेल,
महिलाओं के लिए विकास, सैनिकों के परिवारों के लिए कल्याण, और हर नागरिक के लिए बेहतर जिंदगी के लिए काम करते हैं — बिना किसी भेद के।
यही है वह इंसान जो चित्तौड़ में खड़ा
होकर कह सकता है — और सच में जी सकता है: "हम
सब हिंदुस्तानी पहले हैं।"
क्यों राजस्थान
की आँखें नम हुईं
राजस्थान एक ऐसा प्रदेश है जहाँ शौर्य
और बलिदान की परंपरा घर-घर में जीती है। यहाँ के हर परिवार में किसी न किसी ने फौज
में सेवा की है — और इसीलिए राठौड़ जैसे सेना के अफसर की बात यहाँ के लोग दिल से सुनते
हैं।
जब उन्होंने चित्तौड़ की वीरांगनाओं
को नमन किया और कहा कि उनका बलिदान हम सबका है — तो हर उस मां की आँख में पानी था जिसने
अपना बेटा फौज में दिया है। हर उस बेटी की छाती गर्व से भरी थी जो जानती है कि उसके
पुरखे इसी मिट्टी से हैं।
कर्नल राठौड़ के ऐसे विचार और उनकी जीवन
यात्रा की झलक आप उनके विचारों के पृष्ठ पर देख सकते हैं। उनके सभी कार्यक्रमों और घोषणाओं की ताज़ा जानकारी
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एक सलाम
— जो इतिहास और वर्तमान को जोड़ता है
चित्तौड़गढ़ के जौहर स्थल पर जब राठौड़ ने अपना सिर झुकाया और उन वीरांगनाओं को श्रद्धांजलि दी — वह पल सिर्फ एक कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था।
वह पल था एक सैनिक का दूसरे सैनिकों
को सलाम — भले ही उनके हथियार अलग थे और उनकी लड़ाई अलग थी। वह पल था इतिहास और वर्तमान
के बीच एक धागे का — यह कहते हुए कि जो कुर्बानी उन्होंने दी, वह आज भी ज़िंदा है।
और यही है कर्नल
राज्यवर्धन सिंह राठौड़ — जिनका पूरा परिचय
rajyavardhanrathore.in पर मौजूद है।
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